धार स्थित भोजशाला को लेकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले ने देशभर में नई बहस और नई उम्मीद दोनों को जन्म दे दिया है और विश्व हिन्दू परिषद (VHP) के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक कुमार ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे भारत की सांस्कृतिक चेतना, सत्य और सनातन परंपरा की बड़ी पुष्टि बताया है। उनका कहना है कि यह फैसला केवल एक धार्मिक स्थल का मामला नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत पहचान और प्राचीन ज्ञान परंपरा से जुड़ा हुआ विषय है।
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि धार की भोजशाला हिन्दू मंदिर है और सदैव इसकी पूजा पद्धति हिन्दू मंदिर जैसी रही है। अदालत ने यह भी माना कि हिन्दुओं को यहां निरंतर पूजा का अधिकार है। साथ ही मुस्लिम पक्ष के संदर्भ में कहा गया कि वे मस्जिद के लिए सरकार से वैकल्पिक स्थान की मांग कर सकते हैं।
VHP के आलोक कुमार ने कही यह बात
इस फैसले को लेकर VHP के आलोक कुमार ने कहा कि न्यायपालिका ने पूरे मामले में विधिसम्मत और संतुलित प्रक्रिया अपनाई। उन्होंने जोर देकर कहा कि अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी ASI जैसी विशेषज्ञ संस्था से जांच करवाई, उसकी रिपोर्ट दोनों पक्षों को उपलब्ध कराई और सभी को पर्याप्त अवसर देकर सुनवाई की गई। इतना ही नहीं, न्यायाधीशों ने स्वयं मौके पर जाकर भवन का निरीक्षण भी किया।
आलोक कुमार (VHP) ने कहा कि यह निर्णय भावनाओं के बजाय तथ्यों, पुरातात्विक प्रमाणों और ऐतिहासिक साहित्य के आधार पर आया है। उनके मुताबिक अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि भोजशाला देवी वाग्देवी मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र था।
उन्होंने कहा कि यह फैसला भारत की उस ज्ञान परंपरा की पुनर्पुष्टि है जिसने दुनिया को दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना का मार्ग दिखाया। उन्होंने यह भी कहा कि इस निर्णय को किसी समुदाय की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। समाज के सभी वर्गों को न्यायालय और संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए। उनके अनुसार यह फैसला ऐतिहासिक सत्य और सांस्कृतिक न्याय की पुनर्स्थापना है, जिसे शांति और सौहार्द के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।
‘भोजशाला फिर बने संस्कृत और धर्मशास्त्र का वैश्विक केंद्र’
विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने केवल पूजा-अर्चना तक इस फैसले को सीमित नहीं रखा। आलोक कुमार ने कहा कि भोजशाला को भविष्य में उसी गौरव के साथ विकसित किया जाना चाहिए, जैसा उसका स्वरूप प्राचीन काल में था। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह स्थान फिर से संस्कृत, धर्मशास्त्र और भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन का वैश्विक केंद्र बनेगा। उन्होंने कहा कि समाज और सरकार को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा ताकि भोजशाला केवल विवाद का प्रतीक न रहकर आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बन सके। उनके मुताबिक इस स्थान की ऊर्जा पूरे विश्व में आध्यात्मिक ज्योति फैलाने की क्षमता रखती है।
सरस्वती प्रतिमा की वापसी की मांग
VHP के आलोक कुमार ने उच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का भी स्वागत किया जिसमें केंद्र सरकार से लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने संबंधी अभ्यावेदनों पर विचार करने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि यह प्रतिमा भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है और उसका वास्तविक स्थान भोजशाला ही है। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस दिशा में गंभीर पहल करें ताकि मां सरस्वती की प्रतिमा को उसके मूल स्थान पर पुनर्स्थापित किया जा सके।
विश्व हिन्दू परिषद (VHP) ने उम्मीद जताई है कि अब सरकार और संबंधित संस्थाएं भोजशाला मंदिर के संरक्षण, व्यवस्थापन और संस्कृत अध्ययन की परंपरा को पुनर्जीवित करने के लिए ठोस कदम उठाएंगी। यह फैसला अदालत ने सुना दिया है, लेकिन असली परीक्षा अब प्रशासन, समाज और राजनीतिक नेतृत्व की है कि वे इसे विवाद का नया कारण बनाते हैं या सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का अवसर। भोजशाला पर आया यह फैसला इतिहास, आस्था और कानून के उस संगम पर खड़ा है जहां से आगे का रास्ता केवल अदालतें नहीं, समाज की परिपक्वता तय करेगी।

