वाराणसी में बढ़ते मानव तस्करी और बच्चों के अपहरण के मामलों पर अधिवक्ता विकास सिंह ने जताई चिंता, की सख्त कदम उठाने की मांग

वाराणसी। धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी काशी में हाल के दिनों में देह व्यापार, मानव तस्करी और बच्चों के अपहरण से जुड़े मामलों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। इन घटनाओं को गंभीर मानते हुए वाराणसी के अधिवक्ता विकास सिंह ने प्रशासन से सख्त कदम उठाने और सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत करने की मांग की है।

प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि उपलब्ध सूचनाओं और सामने आए विभिन्न आपराधिक मामलों से यह संकेत मिलता है कि इन अपराधों में संगठित गिरोहों की संलिप्तता हो सकती है। उनका कहना है कि ऐसे अपराध समाज और कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय स्तर के अपराध आंकड़ों के अनुसार देश में हर कुछ मिनट में एक बच्चा लापता दर्ज किया जाता है। इन मामलों में कई बार मानव तस्करी, जबरन श्रम और यौन शोषण जैसे अपराध सामने आते हैं। वाराणसी जिले में भी समय-समय पर बच्चों के अपहरण और तस्करी से जुड़े मामले पुलिस और न्यायालय के अभिलेखों में सामने आते रहे हैं।

अधिवक्ता ने कहा कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी लापता बच्चों के मामलों को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार से पिछले छह वर्षों के लापता बच्चों का विस्तृत आंकड़ा प्रस्तुत करने को कहा है। साथ ही यह भी पूछा गया है कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई संगठित राष्ट्रीय नेटवर्क सक्रिय है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती है।

विकास सिंह का कहना है कि वाराणसी जैसे प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके लिए रेलवे स्टेशन, बस अड्डों, घाटों और अन्य भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को अधिक सक्रिय और प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि लापता बच्चों के मामलों में तुरंत प्राथमिकी दर्ज कर वैज्ञानिक और प्रभावी जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसके साथ ही समाज और प्रशासन के बीच जागरूकता अभियान चलाकर ऐसे संगठित अपराधों पर अंकुश लगाया जा सकता है।

अधिवक्ता विकास सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि समय रहते इन अपराधों के खिलाफ सख्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं रहेगा, बल्कि समाज की मानवीय संवेदनाओं और बच्चों के अधिकारों के लिए भी गंभीर चुनौती बन सकता है।

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