धर्म और संगीत की नगरी वाराणसी (Varanasi) में आयोजित संकट मोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा भक्ति, शास्त्रीय संगीत और सुर-लय की अद्भुत त्रिवेणी के रूप में सामने आई। कार्यक्रम का शुभारंभ परंपरा के अनुरूप भगवान हनुमान की आराधना और मंगलाचरण से हुआ, जिसके बाद पूरी रात संगीतमय साधना का सिलसिला चलता रहा।
इस विशेष संध्या की शुरुआत प्रख्यात शास्त्रीय गायक पंडित उल्हास कशालकर की गंभीर और नादमय प्रस्तुति (Varanasi) से हुई। उन्होंने पारंपरिक रागों के माध्यम से हनुमत दरबार को सुरों से सराबोर कर दिया। उनके गायन में ग्वालियर घराने की समृद्ध परंपरा की झलक स्पष्ट दिखाई दी, जिसे श्रोताओं ने देर रात तक सराहा।
Varanasi: शास्त्रीय संगीत का सुंदर संगम
इसके बाद मंच पर देश की प्रतिष्ठित गायिकाओं ने अपनी प्रस्तुतियों से माहौल को और भी भक्तिमय बना दिया। जसपिंदर नरुला ने भक्ति और शास्त्रीय संगीत का सुंदर संगम प्रस्तुत किया, वहीं कौशिकी चक्रवर्ती (Varanasi) ने अपने मधुर और सधे हुए स्वरों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति में भाव और शास्त्रीयता का अद्भुत संतुलन देखने को मिला।
वाद्य संगीत की श्रृंखला (Varanasi) में पंडित विवेक सोनार ने बांसुरी की मधुर धुनों से संगीत प्रेमियों को भावविभोर कर दिया। वहीं पंडित देबाशीष भट्टाचार्य ने गिटार के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय संगीत को आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत कर खूब सराहना बटोरी।
सरोद वादन में पंडित आलोक लाहिड़ी और अभिषेक लाहिड़ी की जुगलबंदी ने कार्यक्रम में नई ऊर्जा भर दी। दोनों कलाकारों ने सुरों की गहराई और ताल की विविधता का शानदार प्रदर्शन करते हुए श्रोताओं को देर रात तक बांधे रखा।
मंदिर परिसर में देर रात तक भक्तों और संगीत प्रेमियों की भारी भीड़ उमड़ी रही। हर प्रस्तुति के बाद तालियों की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय और ऊर्जावान बना रहा। श्रोता पूरी तन्मयता के साथ इस संगीतमय साधना का आनंद लेते रहे।
गौरतलब है कि यह छह दिवसीय (Varanasi) भव्य आयोजन 6 अप्रैल से 11 अप्रैल तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें देश-विदेश के 150 से अधिक कलाकार भाग ले रहे हैं। प्रतिदिन शाम से लेकर सूर्योदय तक संगीत, नृत्य और वादन की अनवरत प्रस्तुतियां दी जा रही हैं, जो काशी की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखती हैं।

