Varanasi: हनुमान जयंती की धूम में सराबोर हुई काशी, 1100 गदाओं संग 25 हजार भक्त हुए शामिल, 60 फीट लंबे रथ पर विराजे प्रभु

Varanasi: हनुमान जयंती के अवसर पर भक्ति का ऐसा विराट दृश्य देखने को मिला, जिसने मोक्ष नगरी के दक्षिणी छोर को पूरी तरह ‘हनुमन्मय’ बना दिया। श्री हनुमत सेवा समिति, नेवादा द्वारा आयोजित 23वीं ‘श्री हनुमान ध्वजा यात्रा’ में करीब 25,000 श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा और आस्था ने नया कीर्तिमान स्थापित किया।

यात्रा की शुरुआत भिखारीपुर तिराहे से हुई, जहां सुबह सूर्य की पहली किरण के साथ 11 ब्राह्मणों ने 60 फीट लंबे भव्य रथ पर विराजे राम दरबार और पालकी में स्थापित हनुमान जी का विधिवत पूजन-अर्चन किया। इसके बाद 100 से अधिक डमरुओं (Varanasi) की गूंज और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच यात्रा आगे बढ़ी, जिससे पूरा वातावरण ‘जय श्रीराम’ के जयघोष से गुंजायमान हो उठा।

1100 गदाधारी भक्त बने आकर्षण

इस भव्य यात्रा (Varanasi) का सबसे खास दृश्य रहा 1100 भक्तों का हाथों में गदा लेकर चलना, जो बजरंगबली की शक्ति और साहस का प्रतीक बना। साथ ही हजारों केसरिया ध्वजों ने पूरे मार्ग को भगवामय कर दिया। करीब 5.25 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में देश के 7 राज्यों से आए श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों की आकर्षक झांकियों ने सभी का ध्यान खींचा। नेवादा से अघोरी दल और शिव-पार्वती की प्रस्तुति, जानकीनगर से संकट मोचन दरबार (Varanasi) की प्रतिकृति, और बजरडीहा से मध्य प्रदेश का ‘तहलका धमाल बैंड’ प्रमुख आकर्षण रहे। वहीं कोनिया की ‘नारी वाहिनी’ ने तलवार और दंड प्रदर्शन कर शक्ति का परिचय दिया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

Varanasi में नजर आया सेवा का अद्भुत संगम

भीषण गर्मी के बावजूद श्रद्धालुओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। रास्ते में 200 से अधिक सेवा स्टॉल लगाए गए, जहां जूस, छाछ, लस्सी, फल और मेवों का वितरण किया गया। समिति द्वारा 501 किलो लड्डू का प्रसाद भी भक्तों में बांटा गया।

इस वर्ष की यात्रा केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक बड़े सामाजिक संदेश के साथ भी जुड़ी रही। ‘अभियान पवित्र काशी’ के तहत हजारों भक्तों ने काशी (Varanasi) को मांस और मदिरा मुक्त बनाने का संकल्प लिया।

यात्रा में संतों, महंतों और विद्वानों की गरिमामयी उपस्थिति रही। आयोजन को सफल बनाने में समिति के अध्यक्ष रामबली मौर्य, कोषाध्यक्ष अजय मौर्य, संरक्षक डॉ. संतोष ओझा सहित कई पदाधिकारियों की अहम भूमिका रही।

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